शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

BHAY

लघु कथा
                                                                   भय
रघु को काम से घर लौटते आज विलम्ब हो गया था,रात घिर आयी थी। तेज हवाऐ  चल रही थी,लगता था कि कुछ देर में जोरदार बारिश हो ने वाली है। रघु का घर अभी दूर था लेकिन शीघ्र ही आपना घर पहुचना चाहता था।वह तेज कदमों डेग भर रहा था,ताकि वह बारिश आने से पहले ही घर पहुँच जाये । तभी उसकी नजर सङक के किनारे पडी एक लाश पर गई जिसे सडक के किनारे झाङी में फेंक दिया था। रघु लाश देखते ही भयभीत हो गया ,भय से उसकी घिगघी बंध गई।उसे लगा की लाश के भय से  उसके प्राण जायेगे वह थर थर कापंने लगा ।रघु की नजर तभी दूर से आते एक आदमी पडी ,उसे देखते ही उसकी हिम्मत बंधी । उसने सोचा चलो एक से भले दो,अब रास्ता आराम से कट जायेगा।अब डरने की आवशयकता नहीं है। लेकिन उस आदमी ने पास आते ही धमकी देते हुए कहा की जेब मे जितने भी रुपये है ,सब मेरे हवाले कर दो नहीं तो मेरे पिस्तौल के निशाना बन उस लाश की तरह सडक के किनारे पडे नजर आओगे । रघु जो लाश के भय से पहले ही भयभीत था,वह इस नई परिसिथती से और भयभीत हो गया । उसने डर के मारे अपने जेब से सारे रूपये निकल ,उस आदमी के हाथ पर धर दिया । वह आदमी जब रघु को लुट कर चला गया तो रघु सोचने लगा कि वह बेकार ही बेजान लाश से डर रहा था ,जिससे उसे कुछ हानि नहीं पहुचती ।उसे ङरना तो इस सुनसा अनधेरी रात में जीवित मनुष्य से चाहिए था,जो उसे अभी यह आघात दे गया है। अब रघु को उस लाश से कोई भय नहीं लग रहा था,वह निर्भय हो कर अब अपने घर जा रहा था उसे अब पता चल चुका था कि इस दुनिया मे  इनसान  से खतरनाक जीव दुसरा कोई नहीं है

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