बुधवार, 27 जनवरी 2016

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बारे तो बहुत चर्चा होती है , लेकिन आज़ाद हिन्द फ़ौज के बारे मे लोगो को बहुत ही कम जानकारी है ,उस फ़ौज का आज़ादी के बाद कया हस्र हुआ | मस्तिस्क को झकझोकर देने वाली है यह लखे

आज़ाद भारत में अगर किसी व्यक्ति या संस्था के साथ सबसे बड़ा अन्याय और अत्याचार किया गया है तो वह व्यक्ति है नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और संस्था है आज़ाद हिन्द सेना के साथ ऐसा अन्याय और अत्याचार का जिक्र इतिहास में कहीं अन्य सुनने या देखने को नही मिलता है.
जिस आत्म बलिदानी फौज ने देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर अपने को होम कर लिया और जिनके कारण ही यह देशवासी आज आजादी की हवा में सांस ले रहा है. उन लोगो के साथ स्वतंत्रता भारत में जो अमानवीय अन्याय और अत्याचार हुआ. उसे जान कर और सुनकर कोई भी सच्चा भारतीय का सिर शर्म से झुक जायगा.
आज़ाद हिन्द फौज ने निस्वार्थ केवल देश ही स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश शासन से संघर्ष किया और तमाम कष्ट झेलकर अतुलनीय बलिदानी को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा तो दूर की बात मान्यता भी नहीं मिला. आज़ाद हिन्द फौज को अनुसाशनहीन फौज का ठप्पा लगाकर बदनाम कर उन्हें उस समय १९४७ के नियमित भारतीय सेना में शामिल नही होने दिया गया. उस समय के पहले सेनाध्यछ जनरल करियप्पा और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नज़र में आज़ाद हिन्द फौज गद्दार अनुशासन हीन फौज को जमात है जो सुभाष चंद्र बोस की निजी सेना थी. यह बात सांसद के रिकॉर्ड में दर्ज है जब भारतीय संसद में यह प्रस्ताव लाया की आज़ाद हिन्द फौज के सैनिको को भारतीय सेना के मापदंडो के अनुरूप पेंशन और भारतीय सेना अपने सैनिकों को रिटयरमेंट के बाद जो सुविधा देती है वो सब दिया जाय और उन्हें नियमित भारतीय सेना में शामिल किया जाये .
तो तत्कालीन उस समय के देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया और कहा की मैं आज़ाद हिन्द फौज को मान्यता नही देता हूँ ये एक आतंकवादी कृत्य था, मैं किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नही करेंगे. आज़ाद हिन्द फौज के मौत की सजा पाये कैप्टेन अब्बास अली ने अपने आत्मकथा "न रहूँ किसी का दस्तनिगर " में आज़ाद हिन्द फौज के साथ हुए अत्याचार और अन्याय का बेबाकी से वर्ण किया है की कैसे जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अनुशासनहीन फौज ठहरा स्वत्रन्त्रता सेनानी मानने से ही इंकार कर दिया.
जबकि पाकिस्तान के जनक मो अली जिन्ना ने पाकिस्तान गए आज़ाद हिन्द फौज के सैनिको को पुरे सम्मान के साथ उचित मापदंडो के साथ नियमित पाकिस्तानी सेना में शामिल करते है और पुरे सम्मान देते है. पाकिस्तान के हुकमरान आज़ाद हिन्द फौज के सेना को मान्यता और सम्मान देता है. मगर हिंदुस्तान के तत्कालीन सेनाध्यछ जनरल करियप्पा और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू यह मान्यता और सम्मान आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों को नही देते है बल्कि मान्यता और सम्मान देना तो दूर की बात वे तो उन्हें अनुशासनहीन गद्दार फौज का जमात का तमगा देते है. ऐसा अत्याचार और अन्याय किसी भी अन्य देश के इतिहस में नही मिलता है की अपने देश में मर मिटने वाले बलिदान देश प्रेमी सेना के साथ दुर्भाग्य पूर्ण ब्यवहार किया गया है,स्वतंत्रता आंदोलनों के इतिहास में पाठ्य पुस्तको में भी आज़ाद हिन्द फौज के त्याग बलिदान और योगदानो का जिक्र न के बराबर किया गया है या सही रूप से कहा जाये की उनके अमूल्य त्याग, बलिदान और योगदानो का छिपाया , दबाया और मिटाया गया है.
आज़ाद हिन्द फौज के सेनानी के साथ किये गये अत्याचार और अन्याय दर्शाता है की जवाहर लाल नेहरू का नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति जगजाहिर घृणा, विद्वेष और शत्रुता का प्रमाण है, नहेरु को डर था की अगर आज़ाद हिन्द फौज को नियमित भारतीय सेना में शामिल किया गया तो यह फौज तो नेताजी के प्रति समर्पित और विश्वास पात्र है अगर कही बाद में नेताजी को सौप सत्ता देंगे,अपने इसी सत्ता लोलुप मनोवैज्ञानिक डर के कारण उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों के साथ ऐसा अपराधिक पूर्ण घृणा स्पद अत्याचार और अन्याय किया, जवाहर लाल नेहरू ने आज़ाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमांडर सुभाष चन्द्रबोस को जिन्दा और मुर्दा ब्रिटिश को सौपने का संधि भी युद्ध अपराधिक के रूप में कर लिया जबकि यही जवाहर लाल नेहरू ने उस समय हिंदुस्तान की जनता को भ्रमित करने के लिऐ आज़ाद हिन्द फौज के उप्पर अंग्रेजो ने जो मुक़दमे लाल किला में चलाया उसके विरुद्ध पैरवी करने के लिए वकीलों का जो पैनल बना था उसमे अपना भी नाम दर्ज करवा दिया, ताकि देशवासियो को लगे की और उनके जनमानस में यह अंकित हो जाये कि वे भी इस स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेजो के विरुद्ध है और आज़ाद हिन्द फौज के साथ है लेकिन वास्तव में ऐसा नही था सच्चाई यह है की वे उस समय भारतीय देशवासियो के जनभावना और जनमानस के अनुसार जो नेताजी के साथ था, उसके दबाव में सत्ता के लालच में देशभक्त होने का ढंग कर रहे थे, स्वतंत्रता भारत में आज़ाद हिन्द फौज के खजाना जिसे नेताजी देश के स्वतंत्रता युद्ध के लिऐ दुनिया भर में बड़ी मात्र में कीमती हीरे, जवाहर लाल सहित स्वर्ण आभूषण के रूप में मिला था उसे भी नेहरू ने लूट जाने दिया या लूट लिया जो की स्वतंत्रत भारत देश की संपति थी, जिसे भारतीय ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए देश सेवा में नेताजी को सहर्ष और दान किया था, जवाहर लाल नेहरू के मन में सुभाष चन्द्र बोस के प्रति घृणा विद्वेष और तिस्कार या सही कहे तो उनका अदृश्य भय था वह उनके इस प्रकार के गलत निर्णयों के रूप पे साफ - साफ अकलता है कि वे आज़ाद हिन्द फौज और नेताजी से कितने निचले स्तर तक जा कर नफरत करते थे कि कही उनका सत्ता पर तनिक भी आंच न आये जवाहर लाल नेहरू की सत्ता लिप्सा के कारण सुभाष चन्द्र बोस के प्रति घृणा का परिणाम था, आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों के साथ होने वाले अत्याचार अन्याय और दुर्दशा की उन्हें दर - दर भटकना पड़ा। गरीब तेश्हाली भुखमरी और गद्दार जैसे उपमा ले साथ घुट - घुट कर मारना पड़ा। यह स्वतंत्रता भारत का सबसे बड़ा अत्याचार और अन्याय का जीता जागता उदाहरण बन कर रह गया कि इस अन्याय और अत्याचार शिकार केवल १ लाख आज़ाद हिन्द फौज सैनिक ही नही हुए बल उनका परिवारों को भी वह नरक भोगना पड़ा। स्वतंत्रता आंदोलन में शाहीद हुए आज़ाद हिन्द फौज ले सैनिको का सही संख्या तो दूर की बात उनके योगदानों की जिक्र तक नही दोने दिया गया. आज जब नेताजी के बारे में गुप्तकाल का रहस्य २३ जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उजागर करने जा रहे है तो नेताजी के साथ साथ आज़ाद हिन्द फौज के साथ जो बर्बर अन्याय और अत्याचार हुआ है उसके बारे में भी सदस्यों और उत्तरदायी खलनायको नाम और कारनामो के बारे में इन सब कुकृत्य असली नायक कौन है, जिस प्रकार स्वतंत्रता संघर्ष के आंदोलनों में नेताजी के योगदानो और बलिदान को दबाने मिटाने और छिपाने का घिनौना प्रयास किया गया. उससे अधिक आज़ाद हिन्द फौज के स्वतंत्रता संघर्ष में बलिदान त्याग और योगदान कर मिटाने और छिपाने किया गया है, इसका उदाहरण है की सिंगापुर में आज़ाद हिन्द फौज के स्मारक पर स्वतंत्रता भारत के इतिहास में पहली बार १९४७ के बाद २०१५ में कोई देश का प्रधानमंत्री श्रद्धांजलि देने गया है. आज की भारत सरकार के पास आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों की युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की सही संख्या आंकड़े या सूची तक नही है काश स्वतंत्र भारत में इन देश प्रेमी सैनिकों की नियमित भारतीय सैनिकों के रूप में मान्यता दिया जाता तो देश की स्मरिक स्थिति दूसरी ही होती, कश्मीर हमारा होता चीन के हमलों का उचित उत्तर दे पाते सबसे बड़ी देश की विडंबना देखिये १९४७ में देश के स्वतंत्रता के बारे आज़ाद हिन्द फौज का नारा "जय हिन्द" को उस समय के नेता और सेनाध्यछ ने संघर्ष स्वीकार कर अंगीकार कर लिया, लेकिन आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों को ही नही उनके त्याग बलिदान और योगदानों को भी भूला दिया और उन्हें अनुशासनहीन फौज के तमगा या उपमा दे कर अपमानिता कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर दिया , आज नेट और सोशल मीडिया का दौर है तो बहुत कुछ इतिहास के गर्त में दबाये - कुचले हुए इस अत्याचार और अन्याय के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी मिल जाती है नही तो आज भी हम वही जान पाते जो आब तक भारत सरकार नेताजी या उनके फौज के बारे में झूठ - मुठ बता रही थी, आज आज़ाद हिन्द फौज का कौमी तराना कदम-कदम बढाये जा, खुशी की गीत गाये जा, जिंदगी है कौम की कौम पे लुटाए जा,के बारे में देशवासियो से जानकारी लिया जाये तो मुस्किल से केवल केवल एक्का- दुक्का लोग ही इसके बारे में जानकारी दे पायेंगे,क्यूंकि यह गीत किसी सरकारी संचार माध्यम पर न तो बजता है और न ही दिखाया जाता है, स्वतंत्र भारत में अप्रतिम बलिदानी स्वतंत्रता सैनिको के साथ ऐसा अन्याय पूर्ण ब्यवहार अन्य कही नही देकने को मिल सकता है। इससे ही लगता है १९४७ में केवल नाम मांद की ही देश को स्वतंत्रता मिली है. आज देश ब्रिटिश राज का छाया ही राज कर रहा है क्यूंकि आज भी उन्ही के बनाये सिस्टम पर देश का शासन रहा है। और जब ब्रिटिश सिस्टम पर देश चलेगा तो देश स्वतंत्रता सेनानियों आज़ाद हिन्द फौज को सम्मान, मान्यता और न्याय का कहा से उम्मीद कर सकते है क्यूंकि आज़ाद हिन्द फौज तो इन्ही ब्रिटिश सिस्टम के खिलाफ तो संघर्ष कर देश को उनके चंगुल से छुडाने का महान प्रयास किया था.
संतोष कुमार शार्दूल








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