शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

{ लघु कथा} अहसानमंद
मंत्रीजी का साला गाँव से उनके पास सहर घूमने आया वह गाँव में रहने बाला सीधा साधा और भोला था , एक राजनितिक का साला होते हुए भी राजनीती के ज्ञान में शून्य था। वह बैठक खाने में बैठे चुप चाप सब लोगो के बर्तालापो को सुनता रहता। वहां केवल राजनितिक दाब पेंचोki बात होती जो उसके पल्ले नहीं पड़ती। मंत्री जी जब बैठक में बैठे रहते तो लोगो का जमघट लगा रहता , कोई सलाम बजाने आता तो कोई अपना काम कराने। 
एक दिन ऐसे ही बैठक में मंत्री जी के पास एक युबक आया और अनुरोध किया कि 'मंत्री जी कृपया किसी भी चीज का ठेका दिल दीजिए। ठेका के लिए अनुरोध करने वाला युबक मंत्री जी का कट्टर समर्थक और अनुयायी था। मंत्री जी ने उसे एक छोटा सा ठेका दिला देने का आश्वासन दे दिया। वह युबक मंत्री जी का आश्वासन पा प्रशन्न मुद्रा में चला गया। उस युवक के जाते ही एक अन्य नेतानुमा वयक्ति एक नौजवान को लेकर मंत्री जी के पास आया। उस नेतानुमा वयक्ति को देखते ही मंत्री जी उठकर जिंदा दिली से स्वागत किए। वह वयक्ति मंत्री जी द्वारा चुनाब में पराजित बिरोधी दल का उम्मीदबार था। उसने अपने साथ लाएं हुए नौजवान के तरफ इंगित करते हुए मंत्री जी से कहा यह मेरा भतीजा है। इसे कृपा कर के पुल बनाने का प्रस्ताब पास हुआ है। उसका ठेका इसे दिलवा दीजिये। 
मंत्री जी नवे अपने बिरोधी नेता के यह बात को सुनते ही बहुत बिनम्र शब्दोंse बोले ' यह आप क्या बोल रहे है, आपका भतीजा भी मेरा भतीजा हे लगेगा इसमें कृपा करने का क्या बात है। जाइये यह पुल का ठेका आपके भतीजा के नाम। आगे भी अगर कोई मेरे लायक सेवा हो तो अवश्य मौका दीजिएगा। किसी प्रकार की संकोच करने की आवयश्कता नहीं है मुझे अपना ही समझे। बिरोधी दल के नेता अपने मनोकामना को पूर्ण करा कर खुशी चला गया।
मंत्री जी का साला जो बैठक खाने में बैठते बैठते मंत्री जी के सभी समर्थक और बिरोधियो के बारे में जानने और पहचानने लगा था। उससे नहीं रहा गया। उसने अपने जीजा से पूछ ही लिया' जीजा जी मेरे दिमाग में यह बात समझ में नही आती की वयक्ति जो आपका कट्टर समर्थक और अनुयायी था और जिसने चुनाब में आपके लिए बहुत ही काम किआ , उसे आप छोटा सा कम पैसा वाला ठेका दिए और जो आपका बिरोधी है , शत्रु है उसके भतीजे को अपने इतने बड़े पुल का ठेका क्यों दे दिया ? अपने साला का प्रश्न सुन मंत्री जी हस्ते हुए उसके जिज्ञासा शांत करते हुए बोले ' साले साहब यह राजनीतीhai , सबके या आपके समझme नहीं आएगी। मैंने अपने समर्थक युबक को इसलिए छोटा ठेका दिलाया क्यूंकि वह मेरा 
अहसानमंद रहे और आर्थिक रूप से सुढ़ृड भी न हो सके ताकि वह मुझसे और आर्थिक सहायता प्राप्त करने की आशा में मेरा काम अत रहे। अगर वह आर्थिक रूप से समृद्ध हो गया तो वह क्यों मेरे पीछे घूमेगा ? वह समृद्ध होते ही मेरा साथ छोर देगा। इसलिए मैंने उसे हमेशा अपने ऊपर अबलंबित रहने के लिए ही कम पैसा का ठेका दिलवाया और जहाँ तक बिरोधी दल केneta को ठेका दिलवाने की बात है यो मैंने उसके भतीजे को इसलिए बड़ा ठेका दिलवा दिया क्यूंकि बड़ा नेता मेरा - बिरोध न करे और अहसानमंद हो जाए। अगर कल वह मेरे बिरोध में कोई आरोप लाग्या तो यह मेरा सबसे बड़ा हथियार होगा कि मैंने अपने कट्टर बिरोधी नेता के भतीजे को भी ठेका दिया था। 
मंत्री जी द्वारा राजनीती का यह रहस्योद्घटना करने के बाद में उनके साला को यह समझ में आया कि राजनीती का अर्थ वही होता है , जिसके हर कार्य के पीछे कोई न कोई स्वार्थ या स्वहित छिपा हो।

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