करीम गंज में जबरदस्त भूकम्प आया। हज़ारो वैक्ति इस भूकम्प में हताहत हुए। लोगो के घर बार भूकम्प के कारण धवस्त हो गए। इस भूकम्प में जितने वैक्ति मारे गए उससे अधिक घायल हुए। देश विदेश की स्वयं सेवी संस्थाओ ने भूकम्प पीडितो को सहायता प्रदान करना सुरु किया इसी बहती गंगा में हाथ धोने के लिए न जाने कितनी फ़र्ज़ी स्वयं सेवी संस्थाओ ने भूकम्प पीडितो की मदद के लिए रातो रात जल लिया। ऐसे ही एक स्वयं सेवी संस्था के लोग सारिका देवी के मोहल्ले में आये। शारीरिक ह्रदय से अत्यंत कोमल और दयालु थी। जब से उन्होंने इस दर्दनाक प्राकृतिक विपदा के बारे में सुना था। उनकी इच्छा भूकम्प पीडितो को सहायता करने की थी। जब स्वयं सेवी संस्था के स्वयं सेवक उनके घर सहायता मांगने को आये तो उन्होंने घर के सरे पुराने वस्त्र और कुछ रुपये दिए।
सारिका देवी के मन को यह महसूस कर बड़ी शांतिमिली कि चलो वह भी भूकम्प पीडितो की विपरीत के चन में कुछ मददkar सकी।
दो दिनों के बाद सारिका देवी जब बाजार से लौट रही थी तो उनकी दृष्टि पुराने वस्त्र को बेचने वाले की दुकान पर पड़ी। वे
चौक उठी। उसने देखा की उनके बेटे समीर की वही धारीदार कमीज़ और उसके पिता की फूल के छाप वाली कमीज़ वह टंगी थी। उनकी समाज में कुछ नही आया। वे उस दुकानदार के पास गई उसने पूछा भाई साहब आप ये कहाँ कैसे लाय है। दुकानदार यह प्रश्नः सुन के चौक गया और कुछ भी बताने से इंकार करने लगा। जब सारिका देवी ने यह बताया की की यह कपड़ा तो उन्होंने भूकम्प पीडितो के लिए सदयता मांगने वाली एक संस्था को दी थी। तो वस्त्र बिक्रेता से रहा नही गया.
वह बोला मेम साहब वे सदयता मांगने वाली एक संस्था को दी थी। तो वस्त्र बिक्रेता से रहा नहीं गया। वह बोला मेम साहब बे सदस्य्ता मांगने बाले स्वयं सेबी संस्था के लोग नहीं , बल्कि कुछ गलत धंदे करने वाले लोग थे जो भूकम्प पिडीतो के नाम पर सदश्यता मांगते है। और बाद में आपस में सद्यस्ता सामग्री को बाँट लेते है। वही लोग इन पुराने कपड़ो को यहाँ बेच गए है. उनका धंदा ही यही है। यह सुन कर सारिका देवी का मन अपने विस्बास और भावना को ठेस पहुचाने के कारण बक्यति हो गया। उन्हें यह सोच कर अधिक दुःख हो रहा था की अपने दी बिपित में पड़े देशबासियो की सहायताke नाम पर अपने ही देश बसी लोगो के विस्वास को कैसे आहत कर रहे है।
सारिका देवी के मन को यह महसूस कर बड़ी शांतिमिली कि चलो वह भी भूकम्प पीडितो की विपरीत के चन में कुछ मददkar सकी।
दो दिनों के बाद सारिका देवी जब बाजार से लौट रही थी तो उनकी दृष्टि पुराने वस्त्र को बेचने वाले की दुकान पर पड़ी। वे
चौक उठी। उसने देखा की उनके बेटे समीर की वही धारीदार कमीज़ और उसके पिता की फूल के छाप वाली कमीज़ वह टंगी थी। उनकी समाज में कुछ नही आया। वे उस दुकानदार के पास गई उसने पूछा भाई साहब आप ये कहाँ कैसे लाय है। दुकानदार यह प्रश्नः सुन के चौक गया और कुछ भी बताने से इंकार करने लगा। जब सारिका देवी ने यह बताया की की यह कपड़ा तो उन्होंने भूकम्प पीडितो के लिए सदयता मांगने वाली एक संस्था को दी थी। तो वस्त्र बिक्रेता से रहा नही गया.
वह बोला मेम साहब वे सदयता मांगने वाली एक संस्था को दी थी। तो वस्त्र बिक्रेता से रहा नहीं गया। वह बोला मेम साहब बे सदस्य्ता मांगने बाले स्वयं सेबी संस्था के लोग नहीं , बल्कि कुछ गलत धंदे करने वाले लोग थे जो भूकम्प पिडीतो के नाम पर सदश्यता मांगते है। और बाद में आपस में सद्यस्ता सामग्री को बाँट लेते है। वही लोग इन पुराने कपड़ो को यहाँ बेच गए है. उनका धंदा ही यही है। यह सुन कर सारिका देवी का मन अपने विस्बास और भावना को ठेस पहुचाने के कारण बक्यति हो गया। उन्हें यह सोच कर अधिक दुःख हो रहा था की अपने दी बिपित में पड़े देशबासियो की सहायताke नाम पर अपने ही देश बसी लोगो के विस्वास को कैसे आहत कर रहे है।
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