शहरों के बढ़ते
कंक्रीट के जंगलो
में मानवीय सम्बेदनाओ
और भावनाएं कहाँ
गम हो गई
है यह पता
ही नही चलता
है तरक्की मशीनीकरण और बाज़ारवाद के दौर
में हम असंवेदनशीलता के न्यूनतम स्तर पर जा रहे हैं। आधुनिकता और मशीनीकरण के इस दौर में मनुष्य रोबोर्ट
बनने के लिए अति व्य्ग्रह हो रहे हैं. आधुनिकता के इस अंधी दौड़ में व्यक्ति की भावनाएं
संवेदनशीलता मूल्यों आदि एकदम से लुप्त होते जा रहे है। मुझे इस बात का अनुभव ऐसे हुआ
की मेरे ऑफिस के सामने में मैं रोड पर जो स्थिति है वहां बैठने से पता चला कि सामने
से रोजाना ३ से ४ शव वाहन गुजरते है और मैं इन शव वाहनो को सामने से गुजरते हुए कई
सालों से देख रहा हूँ। पहले शव वाहन के पिछे कम से कम २५ से ३० लोगों का समूह होता
था। जो शव के साथ शमशान स्थल तक अंतिम संस्कार
हेतु संग जाता था। लेकिन अब शव वाहन के पीछे
इक्के -दुक्के लोग ही जाते हुए नजर आते है। किसी-किसी शव वाहन में तो मात्र ड्राइवर और खलासी
ही जाते है. समाज में किसी व्यक्ति समहू का अंतिम संस्कार में जुटने वाली भीड़ ही पैमाना
होता है कि समाज में वह कितना मानवीय है। मानवीय
संवेदना या भावनाएं नापने का उससे ही पता चलता है की समाज में कितनी जीवंतता बची हुई
है। सामाजिक मूल्यों और संवेदना का जिस प्रकार
से हमारे समाज में शरण हुआ है उससे लगता है कि जिस प्रकार शादी विवाह या समारोह के
आयोजन में लोग समय के आभाव के कारन कैटरिंग और मैरिज इवेंट व्यवस्था पर आश्रित हो गई
है। अब लोग अपने सगे - सम्बन्धियों के अंतिम
संस्कार में भी प्रकार फ्यूनेरेल इवेंट मैनेजमेंट व्यवस्था लागु होने वाली हैं , क्यूंकि
अब लोगों के पास समय का आभाव तो है ही साथ मानवीय संवेदना मूल्यों एवं भावनाओं का भी
ह्रास हो चूका है। फ़्युनेरल इवेंट मैनजमेंट
व्यवस्था पर आश्रित होना उनकी मज़बूरी हो गई है।
व्यक्ति जहाँ केवल स्व हित या अपने स्वाथ के सीवा और कुछ नही सोचता है वहां
ऐसे ही सामाजिक समस्या उत्पन्न होती होती है।
अब तो सामाजिक परिस्थिति ऐसी हो गई है कि सगे सम्बन्धियों के अंतिम संस्कार
के लिए भाड़े के लोगों और व्यवस्था पर आश्रित होना पड़ रहा है। व्यक्तियों के अंतिम संस्कार में भी ४ लोग नही जुट
रहें हैं मैंने स्वय अपने आखों से एक ऐसी घटना देखि थी जब मेरे ही सोसाइटी में एक निवासी
के पिता के अर्थी को कांधा देने के लिए शव वाहन के ड्राइवर और खलासी की सहयोग करना
पड़ा था। इस घटना से ही सामाजिक संरचना अमानवीयता
और असम्वेंदनशीलता का पता चलता चलता हैं। की
शहर में लोग कितने व्यक्ति वादी और स्वलिप्त हो गये हैं इससे हमारे वर्षो पुरानी सामाजिक
संरचना व्यवस्था और मुल्य ढह रहें हैं। शहर जितने फैलते गये उसमें रहने वाले लोग का
सामाजिक संरचना और परिवेश उतना ही सिकुड़ता गया पहले लोग मोहल्ला आओ कॉलोनियों में रहते
थे। अब सोसयटी में फ्लैट के दायरे में रह गए
हैं। यह शहरीकरण और बाज़ारवाद के कारण होने
वाली दुष्प्रभाव है जो हमारे समाज पर पड़ा हैं। पहले यह दुष्प्रभाव महानगरों तक सिमित
था। फिर
धीरे- धीरे यह छोटे - छोटे नगरों और कस्बों तक को अपने जाल में जगड चुका हैं जिस
प्रकार पॉलिटरी फार्म में चूजे खाद्य पदार्थ
के रूप में तैयार होते हैं , उसी प्रकार मानव विकास एवं जीवनशैली की रूप रेखा बन गई
हैं। वे मानव के बजाए प्रोडक्ट बन गए हैं।
समाज के लिए उनकी अपनी कोई सोच या मानसिकता नही होती है तो सिर्फ बाज़ारवाद शहर
में मानवीय संवेदन के ह्रास का प्रत्यछ प्रमाण तब मिलता हैं जब किसी सड़क दुर्घटना में
लोड पीड़ित घायल व्यक्ति को सहायता करने के बजाय आंखे चुरा के बगल से निकल जाते है,
पीड़ित व्यक्ति सहायता का आस लिए तड़पता रहता
है या फिर दम तोड़ देता हैं। लोग स्वयं को उस घायल पीड़ित और जरूरतमंद व्यक्ति के आपात परिस्थति
से मानवीय असम्बेदनशीलता के कारण स्वयं को नही जोड़ पते हैं। वह यह भूल जाते हैं कि
उन्हें भी उसी पीड़ित की तरह मानवीय सहायता की आवश्यकता पड़ सकती हैं। लोगो में यह विचार आम हो गया है कि इस काम से मुझे
क्या लाभ होगा, यह काम क्यों करू जब तक की मुझे कोई फ़ायदा न मिले। पहले इस प्रकार के अमानवीय विचार को स्वार्थीपन
समझते थे लेकिन अब बाज़ारवाद के दौर में इसे
वास्तविक परिस्थिति की मान्यता मिल गई हैं जिसका पैमाना सिर्फ व्यक्तिवाद हो गया हैं।
वसुदैव कुटुंबकम की सुक्ति केवल एक वाक्य बन कर रह गया है।

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