रविवार, 7 फ़रवरी 2016

जाति और गुटों में बटा टाटा मोटर्स वर्कर्स यूनियन

जाति और गुटों में बटा टाटा मोटर्स वर्कर्स यूनियन



टेल्को वर्कर्स यूनियन का वर्तमान में जो हाल है वो ' हेडलेस चिकन ' के सामान है. कुछ माह पहले टाटा मोटर्स के मजदूरों ने बहुत ही आशा और विश्वास के साथ परिवर्तन के नाम पर मजदूर यूनियन के चुनाव में वर्तमान सताधारी नेताओं को तमाम कठिनाइयों के बावजूद जीताया लेकिन वर्तमान , उनके इस विश्वास और आशा की हत्या हुई और  वह अप्रत्याशित है. ऐसा प्रतीत होता है की आज टेल्को वर्कर्स यूनियन केवल अहम जाति - देश लड़ाई , स्वार्थ एवं  दगाबाजी  का पर्याय  बनकर रह गया है. यह मजदुर नेता मजदूरों के हिट का वास्ता देकर चुनाव जीते है लेकिन आज यह अपने स्वार्थ और अहम के नाम पर और कभी जाती के नाम पर आपस में लड़ रहे है. इसके  परिणामस्वरूप  आज मजदूर इतने असहाय महसूस कर रहे है. जितना की उन्होंने  पहले कवहए नही किया। मजदूर के मतभेद, संघर्ष और चालबाजी  भरी लड़ाइयो का बेयोरा मिर्च मसाले के साथ छप रहा है या वे खुद छपवा रहे है. लेकिन इन नेताओ को इससे कोई फर्क नही पड़ता है उन्हें तो बस अपने हित और स्वार्थ की ही पड़ी  है , वे सिर्फ गुटों में बांटकर लिट्टी पार्टी और गेट टूगेदर जैसे राजनीतिक आयजनों द्वारा सकती प्रदर्शन करने में ही जुटे है. कभी मजदूरो को समस्याओं की राजनीती करने वाले नेता आज अपने अहम और स्वार्थ की राजनीती कर रहे है, इन मजदूर नेताओं ने मजदूरों को पूरी तरह कंपनी प्रबंधन के रहमों करम पर छोड़ दिया है और आपसी गुटबाजी की डर्टी पॉलिटिक्स कर रहे है. टेल्को वर्कर्स यूनियन में गुटबाजी का यह आलम है कि सत्ता पक्छ तो गुटों में बटा ही है विपक्छ  भी इससे अछूता नही है, ऐसे में कौन मजदूरों कि आवाज की मैनेजमेंट तक पहुंचाए भगवान भी नही जानते यूनियन की साड़ी सकती केवल गेट टूगेदर और अन्य आयजनों में ही खर्च हो रहे है जबकि मजदूरों कि सुध लेने का किसी के पास भी समय नही है. इस शक्ति प्रदर्शन से प्रबंधन भी असमंजस और पसोपेश की स्थिति में है, जबकि मजदूर अपने को ठगा सा महसूस कर रहे है, यूनियन के नेता चैपाल सिंड्रोम से ग्रसित हो केवल अपनी छवि को चमकाने के लिए आये दिन समाचारपत्रों में अनगर्ल बयानबाजी कर रहे है और विज्ञत्पि जारी कर रहे है. उन्हें न तो मजदूरो की हित की परवाह है और न ही टेल्को वर्कर्स यूनियन एवं कंपनी के स्वणिर्म इतिहास और छवि की.

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